Topics: Education (244) Maths (238) English (287) Science (74) Lyrics (870) Videos (850) Bollywood (32) Tollywood (71) Michael Jackson (154) IIT JEE (41)

                                              अध्याय 15

                                                 समुच्चयबोधक अव्यय

समुच्चयबोधक अव्यय-  
दो शब्दों, वाक्यांशों या वाक्यों को मिलाने वाले अव्यय समुच्चयबोधक अव्यय कहलाते हैं। इन्हें ‘योजक’ भी कहते हैं। जैसे-
(1) श्रुति और गुंजन पढ़ रहे हैं।
(2) मुझे टेपरिकार्डर या घड़ी चाहिए।
(3) सीता ने बहुत मेहनत की किन्तु फिर भी सफल न हो सकी।
(4) बेशक वह धनवान है परन्तु है कंजूस।
इनमें ‘और’, ‘या’, ‘किन्तु’, ‘परन्तु’ शब्द आए हैं जोकि दो शब्दों अथवा दो वाक्यों को मिला रहे हैं। अतः ये समुच्चयबोधक अव्यय हैं।
समुच्चयबोधक के दो भेद हैं-
1. समानाधिकरण समुच्चयबोधक।
2. व्यधिकरण समुच्चयबोधक।

1. समानाधिकरण समुच्चयबोधक

जिन समुच्चयबोधक शब्दों के द्वारा दो समान वाक्यांशों पदों और वाक्यों को परस्पर जोड़ा जाता है, उन्हें समानाधिकरण समुच्चयबोधक कहते हैं। जैसे- 1.सुनंदा खड़ी थी और अलका बैठी थी। 2.ऋतेश गाएगा तो ऋतु तबला बजाएगी। इन वाक्यों में और, तो समुच्चयबोधक शब्दों द्वारा दो समान शब्द और वाक्य परस्पर जुड़े हैं।
समानाधिकरण समुच्चयबोधक के भेद- समानाधिकरण समुच्चयबोधक चार प्रकार के होते हैं-
(क) संयोजक।
(ख) विभाजक।
(ग) विरोधसूचक।
(घ) परिणामसूचक।

(क) संयोजक- जो शब्दों, वाक्यांशों और उपवाक्यों को परस्पर जोड़ने वाले शब्द संयोजक कहलाते हैं। और, तथा, एवं व आदि संयोजक शब्द हैं।
(ख) विभाजक- शब्दों, वाक्यांशों और उपवाक्यों में परस्पर विभाजन और विकल्प प्रकट करने वाले शब्द विभाजक या विकल्पक कहलाते हैं। जैसे-या, चाहे अथवा, अन्यथा, वा आदि।
(ग) विरोधसूचक- दो परस्पर विरोधी कथनों और उपवाक्यों को जोड़ने वाले शब्द विरोधसूचक कहलाते हैं। जैसे-परन्तु, पर, किन्तु, मगर, बल्कि, लेकिन आदि।
(घ) परिणामसूचक- दो उपवाक्यों को परस्पर जोड़कर परिणाम को दर्शाने वाले शब्द परिणामसूचक कहलाते हैं। जैसे-फलतः, परिणामस्वरूप, इसलिए, अतः, अतएव, फलस्वरूप, अन्यथा आदि।

2. व्यधिकरण समुच्चयबोधक

किसी वाक्य के प्रधान और आश्रित उपवाक्यों को परस्पर जोड़ने वाले शब्द व्यधिकरण समुच्चयबोधक कहलाते हैं।
व्यधिकरण समुच्चयबोधक के भेद- व्यधिकरण समुच्चयबोधक चार प्रकार के होते हैं-
(क) कारणसूचक। (ख) संकेतसूचक। (ग) उद्देश्यसूचक। (घ) स्वरूपसूचक।
 
(क) कारणसूचक- 
दो उपवाक्यों को परस्पर जोड़कर होने वाले कार्य का कारण स्पष्ट करने वाले शब्दों को कारणसूचक कहते हैं। जैसे- कि, क्योंकि, इसलिए, चूँकि, ताकि आदि।
(ख) संकेतसूचक- 
जो दो योजक शब्द दो उपवाक्यों को जोड़ने का कार्य करते हैं, उन्हें संकेतसूचक कहते हैं। 
जैसे- यदि....तो, जा...तो, यद्यपि....तथापि, यद्यपि...परन्तु आदि।
(ग) उदेश्यसूचक- 
दो उपवाक्यों को परस्पर जोड़कर उनका उद्देश्य स्पष्ट करने वाले शब्द उद्देश्यसूचक कहलाते हैं। 
जैसे- इसलिए कि, ताकि, जिससे कि आदि।
(घ) स्वरूपसूचक- 
मुख्य उपवाक्य का अर्थ स्पष्ट करने वाले शब्द स्वरूपसूचक कहलाते हैं। 
जैसे-यानी, मानो, कि, अर्थात् आदि।

                                              अध्याय 14

                                                संबंधबोधक अव्यय

संबंधबोधक अव्यय-  
जिन अव्यय शब्दों से संज्ञा अथवा सर्वनाम का वाक्य के दूसरे शब्दों के साथ संबंध जाना जाता है, वे संबंधबोधक अव्यय कहलाते हैं। 
जैसे- 1. उसका साथ छोड़ दीजिए। 
2.मेरे सामने से हट जा। 
3.लालकिले पर तिरंगा लहरा रहा है। 
4.वीर अभिमन्यु अंत तक शत्रु से लोहा लेता रहा। 
इनमें ‘साथ’, ‘सामने’, ‘पर’, ‘तक’ शब्द संज्ञा अथवा सर्वनाम शब्दों के साथ आकर उनका संबंध वाक्य के दूसरे शब्दों के साथ बता रहे हैं। अतः वे संबंधबोधक अव्यय है।
 
अर्थ के अनुसार संबंधबोधक अव्यय के निम्नलिखित भेद हैं-
1. कालवाचक- पहले, बाद, आगे, पीछे।
2. स्थानवाचक- बाहर, भीतर, बीच, ऊपर, नीचे।
3. दिशावाचक- निकट, समीप, ओर, सामने।
4. साधनवाचक- निमित्त, द्वारा, जरिये।
5. विरोधसूचक- उलटे, विरुद्ध, प्रतिकूल।
6. समतासूचक- अनुसार, सदृश, समान, तुल्य, तरह।
7. हेतुवाचक- रहित, अथवा, सिवा, अतिरिक्त।
8. सहचरसूचक- समेत, संग, साथ।
9. विषयवाचक- विषय, बाबत, लेख।
10. संग्रवाचक- समेत, भर, तक।

क्रिया-विशेषण और संबंधबोधक अव्यय में अंतर

जब इनका प्रयोग संज्ञा अथवा सर्वनाम के साथ होता है तब ये संबंधबोधक अव्यय होते हैं और जब ये क्रिया की विशेषता प्रकट करते हैं तब क्रिया-विशेषण होते हैं। जैसे-
(1) अंदर जाओ। (क्रिया विशेषण)
(2) दुकान के भीतर जाओ। (संबंधबोधक अव्यय)

                                                अध्याय 13

                                                           क्रिया-विशेषण

क्रिया-विशेषण- 
जो शब्द क्रिया की विशेषता प्रकट करते हैं वे क्रिया-विशेषण कहलाते हैं। 
जैसे- 1.सोहन सुंदर लिखता है। 
2.गौरव यहाँ रहता है। 
3.संगीता प्रतिदिन पढ़ती है। 
इन वाक्यों में ‘सुन्दर’, ‘यहाँ’ और ‘प्रतिदिन’ शब्द क्रिया की विशेषता बतला रहे हैं। अतः ये शब्द क्रिया-विशेषण हैं।
 
अर्थानुसार क्रिया-विशेषण के निम्नलिखित चार भेद हैं-
1. कालवाचक क्रिया-विशेषण।
2. स्थानवाचक क्रिया-विशेषण।
3. परिमाणवाचक क्रिया-विशेषण।
4. रीतिवाचक क्रिया-विशेषण।
 
1.कालवाचक क्रिया-विशेषण- जिस क्रिया-विशेषण शब्द से कार्य के होने का समय ज्ञात हो वह कालवाचक क्रिया-विशेषण कहलाता है। इसमें बहुधा ये शब्द प्रयोग में आते हैं- यदा, कदा, जब, तब, हमेशा, तभी, तत्काल, निरंतर, शीघ्र, पूर्व, बाद, पीछे, घड़ी-घड़ी, अब, तत्पश्चात्, तदनंतर, कल, कई बार, अभी फिर कभी आदि।
 
2.स्थानवाचक क्रिया-विशेषण- जिस क्रिया-विशेषण शब्द द्वारा क्रिया के होने के स्थान का बोध हो वह स्थानवाचक क्रिया-विशेषण कहलाता है। इसमें बहुधा ये शब्द प्रयोग में आते हैं- भीतर, बाहर, अंदर, यहाँ, वहाँ, किधर, उधर, इधर, कहाँ, जहाँ, पास, दूर, अन्यत्र, इस ओर, उस ओर, दाएँ, बाएँ, ऊपर, नीचे आदि।
 
3.परिमाणवाचक क्रिया-विशेषण-जो शब्द क्रिया का परिमाण बतलाते हैं वे ‘परिमाणवाचक क्रिया-विशेषण’ कहलाते हैं। इसमें बहुधा थोड़ा-थोड़ा, अत्यंत, अधिक, अल्प, बहुत, कुछ, पर्याप्त, प्रभूत, कम, न्यून, बूँद-बूँद, स्वल्प, केवल, प्रायः अनुमानतः, सर्वथा आदि शब्द प्रयोग में आते हैं।
कुछ शब्दों का प्रयोग परिमाणवाचक विशेषण और परिमाणवाचक क्रिया-विशेषण दोनों में समान रूप से किया जाता है। जैसे-थोड़ा, कम, कुछ काफी आदि।
 
4.रीतिवाचक क्रिया-विशेषण- जिन शब्दों के द्वारा क्रिया के संपन्न होने की रीति का बोध होता है वे ‘रीतिवाचक क्रिया-विशेषण’ कहलाते हैं। इनमें बहुधा ये शब्द प्रयोग में आते हैं- अचानक, सहसा, एकाएक, झटपट, आप ही, ध्यानपूर्वक, धड़ाधड़, यथा, तथा, ठीक, सचमुच, अवश्य, वास्तव में, निस्संदेह, बेशक, शायद, संभव हैं, कदाचित्, बहुत करके, हाँ, ठीक, सच, जी, जरूर, अतएव, किसलिए, क्योंकि, नहीं, न, मत, कभी नहीं, कदापि नहीं आदि।