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                                                   अध्याय 24

                                                              वाक्य-प्रकरण

वाक्य- 
एक विचार को पूर्णता से प्रकट करने वाला शब्द-समूह वाक्य कहलाता है। जैसे- 
1. श्याम दूध पी रहा है। 
2. मैं भागते-भागते थक गया। 
3. यह कितना सुंदर उपवन है। 
4. ओह ! आज तो गरमी के कारण प्राण निकले जा रहे हैं। 
5. वह मेहनत करता तो पास हो जाता।
ये सभी मुख से निकलने वाली सार्थक ध्वनियों के समूह हैं। अतः ये वाक्य हैं। वाक्य भाषा का चरम अवयव है।

वाक्य-खंड

वाक्य के प्रमुख दो खंड हैं-
1. उद्देश्य।
2. विधेय।
 
1. उद्देश्य- जिसके विषय में कुछ कहा जाता है उसे सूचकि करने वाले शब्द को उद्देश्य कहते हैं। जैसे-
1. अर्जुन ने जयद्रथ को मारा।
2. कुत्ता भौंक रहा है।
3. तोता डाल पर बैठा है।
इनमें अर्जुन ने, कुत्ता, तोता उद्देश्य हैं; इनके विषय में कुछ कहा गया है। अथवा यों कह सकते हैं कि वाक्य में जो कर्ता हो उसे उद्देश्य कह सकते हैं क्योंकि किसी क्रिया को करने के कारण वही मुख्य होता है।
 
2. विधेय- उद्देश्य के विषय में जो कुछ कहा जाता है, अथवा उद्देश्य (कर्ता) जो कुछ कार्य करता है वह सब विधेय कहलाता है। जैसे-
1. अर्जुन ने जयद्रथ को मारा।
2. कुत्ता भौंक रहा है।
3. तोता डाल पर बैठा है।
इनमें ‘जयद्रथ को मारा’, ‘भौंक रहा है’, ‘डाल पर बैठा है’ विधेय हैं क्योंकि अर्जुन ने, कुत्ता, तोता,-इन उद्देश्यों (कर्ताओं) के कार्यों के विषय में क्रमशः मारा, भौंक रहा है, बैठा है, ये विधान किए गए हैं, अतः इन्हें विधेय कहते हैं।
 
उद्देश्य का विस्तार- 
कई बार वाक्य में उसका परिचय देने वाले अन्य शब्द भी साथ आए होते हैं। ये अन्य शब्द उद्देश्य का विस्तार कहलाते हैं। जैसे-
1. सुंदर पक्षी डाल पर बैठा है।
2. काला साँप पेड़ के नीचे बैठा है।
इनमें सुंदर और काला शब्द उद्देश्य का विस्तार हैं।
 
उद्देश्य में निम्नलिखित शब्द-भेदों का प्रयोग होता है-
(1) संज्ञा- घोड़ा भागता है।
(2) सर्वनाम- वह जाता है।
(3) विशेषण- विद्वान की सर्वत्र पूजा होती है।
(4) क्रिया-विशेषण- (जिसका) भीतर-बाहर एक-सा हो।
(5) वाक्यांश- झूठ बोलना पाप है।
 
वाक्य के साधारण उद्देश्य में विशेषणादि जोड़कर उसका विस्तार करते हैं। उद्देश्य का विस्तार नीचे लिखे शब्दों के द्वारा प्रकट होता है-
(1) विशेषण से- अच्छा बालक आज्ञा का पालन करता है।
(2) संबंध कारक से- दर्शकों की भीड़ ने उसे घेर लिया।
(3) वाक्यांश से- काम सीखा हुआ कारीगर कठिनाई से मिलता है।
 
विधेय का विस्तार- मूल विधेय को पूर्ण करने के लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया जाता है वे विधेय का विस्तार कहलाते हैं। जैसे-
वह अपने पैन से लिखता है। इसमें अपने विधेय का विस्तार है।
कर्म का विस्तार- इसी तरह कर्म का विस्तार हो सकता है। जैसे-मित्र, अच्छी पुस्तकें पढ़ो। इसमें अच्छी कर्म का विस्तार है।
क्रिया का विस्तार- इसी तरह क्रिया का भी विस्तार हो सकता है। जैसे-श्रेय मन लगाकर पढ़ता है। मन लगाकर क्रिया का विस्तार है।

वाक्य-भेद

रचना के अनुसार वाक्य के निम्नलिखित भेद हैं-
1. साधारण वाक्य।
2. संयुक्त वाक्य।
3. मिश्रित वाक्य।

1. साधारण वाक्य

जिस वाक्य में केवल एक ही उद्देश्य (कर्ता) और एक ही समापिका क्रिया हो, वह साधारण वाक्य कहलाता है। जैसे- 1. बच्चा दूध पीता है। 
2. कमल गेंद से खेलता है। 
3. मृदुला पुस्तक पढ़ रही हैं।
 
विशेष-इसमें कर्ता के साथ उसके विस्तारक विशेषण और क्रिया के साथ विस्तारक सहित कर्म एवं क्रिया-विशेषण आ सकते हैं। जैसे-अच्छा बच्चा मीठा दूध अच्छी तरह पीता है। यह भी साधारण वाक्य है।

2. संयुक्त वाक्य

दो अथवा दो से अधिक साधारण वाक्य जब सामानाधिकरण समुच्चयबोधकों जैसे- (पर, किन्तु, और, या आदि) से जुड़े होते हैं, तो वे संयुक्त वाक्य कहलाते हैं। ये चार प्रकार के होते हैं।
(1) संयोजक- 
जब एक साधारण वाक्य दूसरे साधारण या मिश्रित वाक्य से संयोजक अव्यय द्वारा जुड़ा होता है। जैसे-गीता गई और सीता आई।
(2) विभाजक- 
जब साधारण अथवा मिश्र वाक्यों का परस्पर भेद या विरोध का संबंध रहता है। जैसे-वह मेहनत तो बहुत करता है पर फल नहीं मिलता।
(3) विकल्पसूचक- 
जब दो बातों में से किसी एक को स्वीकार करना होता है। जैसे- या तो उसे मैं अखाड़े में पछाड़ूँगा या अखाड़े में उतरना ही छोड़ दूँगा।
(4) परिणामबोधक- 
जब एक साधारण वाक्य दसूरे साधारण या मिश्रित वाक्य का परिणाम होता है। जैसे- आज मुझे बहुत काम है इसलिए मैं तुम्हारे पास नहीं आ सकूँगा।

3. मिश्रित वाक्य

जब किसी विषय पर पूर्ण विचार प्रकट करने के लिए कई साधारण वाक्यों को मिलाकर एक वाक्य की रचना करनी पड़ती है तब ऐसे रचित वाक्य ही मिश्रित वाक्य कहलाते हैं।
विशेष- (1) इन वाक्यों में एक मुख्य या प्रधान उपवाक्य और एक अथवा अधिक आश्रित उपवाक्य होते हैं जो समुच्चयबोधक अव्यय से जुड़े होते हैं।
(2) मुख्य उपवाक्य की पुष्टि, समर्थन, स्पष्टता अथवा विस्तार हेतु ही आश्रित वाक्य आते है।
 
आश्रित वाक्य तीन प्रकार के होते हैं-
(1) संज्ञा उपवाक्य।
(2) विशेषण उपवाक्य।
(3) क्रिया-विशेषण उपवाक्य।
 
1. संज्ञा उपवाक्य- 
जब आश्रित उपवाक्य किसी संज्ञा अथवा सर्वनाम के स्थान पर आता है तब वह संज्ञा उपवाक्य कहलाता है। जैसे- वह चाहता है कि मैं यहाँ कभी न आऊँ। यहाँ कि मैं कभी न आऊँ, यह संज्ञा उपवाक्य है।
2. विशेषण उपवाक्य- 
जो आश्रित उपवाक्य मुख्य उपवाक्य की संज्ञा शब्द अथवा सर्वनाम शब्द की विशेषता बतलाता है वह विशेषण उपवाक्य कहलाता है। जैसे- जो घड़ी मेज पर रखी है वह मुझे पुरस्कारस्वरूप मिली है। यहाँ जो घड़ी मेज पर रखी है यह विशेषण उपवाक्य है।
3. क्रिया-विशेषण उपवाक्य- 
जब आश्रित उपवाक्य प्रधान उपवाक्य की क्रिया की विशेषता बतलाता है तब वह क्रिया-विशेषण उपवाक्य कहलाता है। जैसे- जब वह मेरे पास आया तब मैं सो रहा था। यहाँ पर जब वह मेरे पास आया यह क्रिया-विशेषण उपवाक्य है।

वाक्य-परिवर्तन

वाक्य के अर्थ में किसी तरह का परिवर्तन किए बिना उसे एक प्रकार के वाक्य से दूसरे प्रकार के वाक्य में परिवर्तन करना वाक्य-परिवर्तन कहलाता है।
 
(1) साधारण वाक्यों का संयुक्त वाक्यों में परिवर्तन-
साधारण वाक्य संयुक्त वाक्य
1. मैं दूध पीकर सो गया। मैंने दूध पिया और सो गया।
2. वह पढ़ने के अलावा अखबार भी बेचता है। वह पढ़ता भी है और अखबार भी बेचता है
3. मैंने घर पहुँचकर सब बच्चों को खेलते हुए देखा। मैंने घर पहुँचकर देखा कि सब बच्चे खेल रहे थे।
4. स्वास्थ्य ठीक न होने से मैं काशी नहीं जा सका। मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं था इसलिए मैं काशी नहीं जा सका।
5. सवेरे तेज वर्षा होने के कारण मैं दफ्तर देर से पहुँचा। सवेरे तेज वर्षा हो रही थी इसलिए मैं दफ्तर देर से पहुँचा।
 
(2) संयुक्त वाक्यों का साधारण वाक्यों में परिवर्तन-
संयुक्त वाक्य साधारण वाक्य
1. पिताजी अस्वस्थ हैं इसलिए मुझे जाना ही पड़ेगा। पिताजी के अस्वस्थ होने के कारण मुझे जाना ही पड़ेगा।
2. उसने कहा और मैं मान गया। उसके कहने से मैं मान गया।
3. वह केवल उपन्यासकार ही नहीं अपितु अच्छा वक्ता भी है। वह उपन्यासकार के अतिरिक्त अच्छा वक्ता भी है।
4. लू चल रही थी इसलिए मैं घर से बाहर नहीं निकल सका। लू चलने के कारण मैं घर से बाहर नहीं निकल सका।
5. गार्ड ने सीटी दी और ट्रेन चल पड़ी। गार्ड के सीटी देने पर ट्रेन चल पड़ी।
 
(3) साधारण वाक्यों का मिश्रित वाक्यों में परिवर्तन- साधारण वाक्य मिश्रित वाक्य
1. हरसिंगार को देखते ही मुझे गीता की याद आ जाती है। जब मैं हरसिंगार की ओर देखता हूँ तब मुझे गीता की याद आ जाती है।
2. राष्ट्र के लिए मर मिटने वाला व्यक्ति सच्चा राष्ट्रभक्त है। वह व्यक्ति सच्चा राष्ट्रभक्त है जो राष्ट्र के लिए मर मिटे।
3. पैसे के बिना इंसान कुछ नहीं कर सकता। यदि इंसान के पास पैसा नहीं है तो वह कुछ नहीं कर सकता।
4. आधी रात होते-होते मैंने काम करना बंद कर दिया। ज्योंही आधी रात हुई त्योंही मैंने काम करना बंद कर दिया।
(4) मिश्रित वाक्यों का साधारण वाक्यों में परिवर्तन-
 
मिश्रित वाक्य साधारण वाक्य
1. जो संतोषी होते हैं वे सदैव सुखी रहते हैं संतोषी सदैव सुखी रहते हैं।
2. यदि तुम नहीं पढ़ोगे तो परीक्षा में सफल नहीं होगे। न पढ़ने की दशा में तुम परीक्षा में सफल नहीं होगे।
3. तुम नहीं जानते कि वह कौन है ? तुम उसे नहीं जानते।
4. जब जेबकतरे ने मुझे देखा तो वह भाग गया। मुझे देखकर जेबकतरा भाग गया।
5. जो विद्वान है, उसका सर्वत्र आदर होता है। विद्वानों का सर्वत्र आदर होता है।

वाक्य-विश्लेषण

वाक्य में आए हुए शब्द अथवा वाक्य-खंडों को अलग-अलग करके उनका पारस्परिक संबंध बताना वाक्य-विश्लेषण कहलाता है।
 
साधारण वाक्यों का विश्लेषण
1. हमारा राष्ट्र समृद्धशाली है।
2. हमें नियमित रूप से विद्यालय आना चाहिए।
3. अशोक, सोहन का बड़ा पुत्र, पुस्तकालय में अच्छी पुस्तकें छाँट रहा है।
 
उद्देश्य विधेय
वाक्य उद्देश्य उद्देश्य का क्रिया कर्म कर्म का पूरक विधेय क्रमांक कर्ता विस्तार विस्तार का विस्तार
1. राष्ट्र हमारा है - - समृद्ध -
2. हमें - आना विद्यालय - शाली नियमित
चाहिए रूप से
3. अशोक सोहन का छाँट रहा पुस्तकें अच्छी पुस्तकालय
बड़ा पुत्र है में
 
मिश्रित वाक्य का विश्लेषण-
1. जो व्यक्ति जैसा होता है वह दूसरों को भी वैसा ही समझता है।
2. जब-जब धर्म की क्षति होती है तब-तब ईश्वर का अवतार होता है।
3. मालूम होता है कि आज वर्षा होगी।
4. जो संतोषी होत हैं वे सदैव सुखी रहते हैं।
5. दार्शनिक कहते हैं कि जीवन पानी का बुलबुला है।
 
संयुक्त वाक्य का विश्लेषण-
1. तेज वर्षा हो रही थी इसलिए परसों मैं तुम्हारे घर नहीं आ सका।
2. मैं तुम्हारी राह देखता रहा पर तुम नहीं आए।
3. अपनी प्रगति करो और दूसरों का हित भी करो तथा स्वार्थ में न हिचको।

अर्थ के अनुसार वाक्य के प्रकार

अर्थानुसार वाक्य के निम्नलिखित आठ भेद हैं-
1. विधानार्थक वाक्य।
2. निषेधार्थक वाक्य।
3. आज्ञार्थक वाक्य।
4. प्रश्नार्थक वाक्य।
5. इच्छार्थक वाक्य।
6. संदेर्थक वाक्य।
7. संकेतार्थक वाक्य।
8. विस्मयबोधक वाक्य।
 
1. विधानार्थक वाक्य-
जिन वाक्यों में क्रिया के करने या होने का सामान्य कथन हो। जैसे-मैं कल दिल्ली जाऊँगा। पृथ्वी गोल है।
2. निषेधार्थक वाक्य- 
जिस वाक्य से किसी बात के न होने का बोध हो। जैसे-मैं किसी से लड़ाई मोल नहीं लेना चाहता।
3. आज्ञार्थक वाक्य- 
जिस वाक्य से आज्ञा उपदेश अथवा आदेश देने का बोध हो। जैसे-शीघ्र जाओ वरना गाड़ी छूट जाएगी। आप जा सकते हैं।
4. प्रश्नार्थक वाक्य- 
जिस वाक्य में प्रश्न किया जाए। जैसे-वह कौन हैं उसका नाम क्या है।
5. इच्छार्थक वाक्य- 
जिस वाक्य से इच्छा या आशा के भाव का बोध हो। जैसे-दीर्घायु हो। धनवान हो।
6. संदेहार्थक वाक्य- 
जिस वाक्य से संदेह का बोध हो। जैसे-शायद आज वर्षा हो। अब तक पिताजी जा चुके होंगे।
7. संकेतार्थक वाक्य- 
जिस वाक्य से संकेत का बोध हो। जैसे-यदि तुम कन्याकुमारी चलो तो मैं भी चलूँ।
8. विस्मयबोधक वाक्य-
जिस वाक्य से विस्मय के भाव प्रकट हों। जैसे-अहा ! कैसा सुहावना मौसम है।

                                                 अध्याय 23

                                                               विराम-चिह्न

विराम-चिह्न-  
‘विराम’ शब्द का अर्थ है ‘रुकना’। जब हम अपने भावों को भाषा के द्वारा व्यक्त करते हैं तब एक भाव की अभिव्यक्ति के बाद कुछ देर रुकते हैं, यह रुकना ही विराम कहलाता है।
इस विराम को प्रकट करने हेतु जिन कुछ चिह्नों का प्रयोग किया जाता है, विराम-चिह्न कहलाते हैं। वे इस प्रकार हैं-
 
1. अल्प विराम (,)- पढ़ते अथवा बोलते समय बहुत थोड़ा रुकने के लिए अल्प विराम-चिह्न का प्रयोग किया जाता है। जैसे-सीता, गीता और लक्ष्मी। यह सुंदर स्थल, जो आप देख रहे हैं, बापू की समाधि है। हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश विधि हाथ।
 
2. अर्ध विराम (;)- जहाँ अल्प विराम की अपेक्षा कुछ ज्यादा देर तक रुकना हो वहाँ इस अर्ध-विराम चिह्न का प्रयोग किया जाता है। जैसे-सूर्योदय हो गया; अंधकार न जाने कहाँ लुप्त हो गया।
 
3. पूर्ण विराम (।)- जहाँ वाक्य पूर्ण होता है वहाँ पूर्ण विराम-चिह्न का प्रयोग किया जाता है। जैसे-मोहन पुस्तक पढ़ रहा है। वह फूल तोड़ता है।
 
4. विस्मयादिबोधक चिह्न (!)- विस्मय, हर्ष, शोक, घृणा आदि भावों को दर्शाने वाले शब्द के बाद अथवा कभी-कभी ऐसे वाक्यांश या वाक्य के अंत में भी विस्मयादिबोधक चिह्न का प्रयोग किया जाता है। जैसे- हाय ! वह बेचारा मारा गया। वह तो अत्यंत सुशील था ! बड़ा अफ़सोस है !
 
5. प्रश्नवाचक चिह्न (?)- प्रश्नवाचक वाक्यों के अंत में प्रश्नवाचक चिह्न का प्रयोग किया जाता है। जैसे-किधर चले ? तुम कहाँ रहते हो ?
 
6. कोष्ठक ()- इसका प्रयोग पद (शब्द) का अर्थ प्रकट करने हेतु, क्रम-बोध और नाटक या एकांकी में अभिनय के भावों को व्यक्त करने के लिए किया जाता है। जैसे-निरंतर (लगातार) व्यायाम करते रहने से देह (शरीर) स्वस्थ रहता है। विश्व के महान राष्ट्रों में (1) अमेरिका, (2) रूस, (3) चीन, (4) ब्रिटेन आदि हैं।
नल-(खिन्न होकर) ओर मेरे दुर्भाग्य ! तूने दमयंती को मेरे साथ बाँधकर उसे भी जीवन-भर कष्ट दिया।
 
7. निर्देशक चिह्न (-)- इसका प्रयोग विषय-विभाग संबंधी प्रत्येक शीर्षक के आगे, वाक्यों, वाक्यांशों अथवा पदों के मध्य विचार अथवा भाव को विशिष्ट रूप से व्यक्त करने हेतु, उदाहरण अथवा जैसे के बाद, उद्धरण के अंत में, लेखक के नाम के पूर्व और कथोपकथन में नाम के आगे किया जाता है। जैसे-समस्त जीव-जंतु-घोड़ा, ऊँट, बैल, कोयल, चिड़िया सभी व्याकुल थे। तुम सो रहे हो- अच्छा, सोओ।
द्वारपाल-भगवन ! एक दुबला-पतला ब्राह्मण द्वार पर खड़ा है।
 
8. उद्धरण चिह्न (‘‘ ’’)- जब किसी अन्य की उक्ति को बिना किसी परिवर्तन के ज्यों-का-त्यों रखा जाता है, तब वहाँ इस चिह्न का प्रयोग किया जाता है। इसके पूर्व अल्प विराम-चिह्न लगता है। जैसे-नेताजी ने कहा था, ‘‘तुम हमें खून दो, हम तुम्हें आजादी देंगे।’’, ‘‘ ‘रामचरित मानस’ तुलसी का अमर काव्य ग्रंथ है।’’
 
9. आदेश चिह्न (:- )- किसी विषय को क्रम से लिखना हो तो विषय-क्रम व्यक्त करने से पूर्व इसका प्रयोग किया जाता है। जैसे-सर्वनाम के प्रमुख पाँच भेद हैं :-
(1) पुरुषवाचक, (2) निश्चयवाचक, (3) अनिश्चयवाचक, (4) संबंधवाचक, (5) प्रश्नवाचक।
 
10. योजक चिह्न (-)- समस्त किए हुए शब्दों में जिस चिह्न का प्रयोग किया जाता है, वह योजक चिह्न कहलाता है। जैसे-माता-पिता, दाल-भात, सुख-दुख, पाप-पुण्य।
 
11. लाघव चिह्न (.)- किसी बड़े शब्द को संक्षेप में लिखने के लिए उस शब्द का प्रथम अक्षर लिखकर उसके आगे शून्य लगा देते हैं। जैसे-पंडित=पं., डॉक्टर=डॉ., प्रोफेसर=प्रो.।

                                                    अध्याय 22

                                                                  शब्द-ज्ञान

1. पर्यायवाची शब्द

किसी शब्द-विशेष के लिए प्रयुक्त समानार्थक शब्दों को पर्यायवाची शब्द कहते हैं। यद्यपि पर्यायवाची शब्द समानार्थी होते हैं किन्तु भाव में एक-दूसरे से किंचित भिन्न होते हैं।
1.अमृत- सुधा, सोम, पीयूष, अमिय।
2.असुर- राक्षस, दैत्य, दानव, निशाचर।
3.अग्नि- आग, अनल, पावक, वह्नि।
4.अश्व- घोड़ा, हय, तुरंग, बाजी।
5.आकाश- गगन, नभ, आसमान, व्योम, अंबर।
6.आँख- नेत्र, दृग, नयन, लोचन।
7.इच्छा- आकांक्षा, चाह, अभिलाषा, कामना।
8.इंद्र- सुरेश, देवेंद्र, देवराज, पुरंदर।
9.ईश्वर- प्रभु, परमेश्वर, भगवान, परमात्मा।
10.कमल- जलज, पंकज, सरोज, राजीव, अरविन्द।
11.गरमी- ग्रीष्म, ताप, निदाघ, ऊष्मा।
12.गृह- घर, निकेतन, भवन, आलय।
13.गंगा- सुरसरि, त्रिपथगा, देवनदी, जाह्नवी, भागीरथी।
14.चंद्र- चाँद, चंद्रमा, विधु, शशि, राकेश।
15.जल- वारि, पानी, नीर, सलिल, तोय।
16.नदी- सरिता, तटिनी, तरंगिणी, निर्झरिणी।
17.पवन- वायु, समीर, हवा, अनिल।
18.पत्नी- भार्या, दारा, अर्धागिनी, वामा।
19.पुत्र- बेटा, सुत, तनय, आत्मज।
20.पुत्री-बेटी, सुता, तनया, आत्मजा।
21.पृथ्वी- धरा, मही, धरती, वसुधा, भूमि, वसुंधरा।
22.पर्वत- शैल, नग, भूधर, पहाड़।
23.बिजली- चपला, चंचला, दामिनी, सौदामनी।
24.मेघ- बादल, जलधर, पयोद, पयोधर, घन।
25.राजा- नृप, नृपति, भूपति, नरपति।
26.रजनी- रात्रि, निशा, यामिनी, विभावरी।
27.सर्प- सांप, अहि, भुजंग, विषधर।
28.सागर- समुद्र, उदधि, जलधि, वारिधि।
29.सिंह- शेर, वनराज, शार्दूल, मृगराज।
30.सूर्य- रवि, दिनकर, सूरज, भास्कर।
31.स्त्री- ललना, नारी, कामिनी, रमणी, महिला।
32.शिक्षक- गुरु, अध्यापक, आचार्य, उपाध्याय।
33.हाथी- कुंजर, गज, द्विप, करी, हस्ती।

2. अनेक शब्दों के लिए एक शब्द

1 जिसे देखकर डर (भय) लगे डरावना, भयानक
2 जो स्थिर रहे स्थावर
3 ज्ञान देने वाली ज्ञानदा
4 भूत-वर्तमान-भविष्य को देखने (जानने) वाले त्रिकालदर्शी
5 जानने की इच्छा रखने वाला जिज्ञासु
6 जिसे क्षमा न किया जा सके अक्षम्य
7 पंद्रह दिन में एक बार होने वाला पाक्षिक
8 अच्छे चरित्र वाला सच्चरित्र
9 आज्ञा का पालन करने वाला आज्ञाकारी
10 रोगी की चिकित्सा करने वाला चिकित्सक
11 सत्य बोलने वाला सत्यवादी
12 दूसरों पर उपकार करने वाला उपकारी
13 जिसे कभी बुढ़ापा न आये अजर
14 दया करने वाला दयालु
15 जिसका आकार न हो निराकार
16 जो आँखों के सामने हो प्रत्यक्ष
17 जहाँ पहुँचा न जा सके अगम, अगम्य
18 जिसे बहुत कम ज्ञान हो, थोड़ा जानने वाला अल्पज्ञ
19 मास में एक बार आने वाला मासिक
20 जिसके कोई संतान न हो निस्संतान
21 जो कभी न मरे अमर
22 जिसका आचरण अच्छा न हो दुराचारी
23 जिसका कोई मूल्य न हो अमूल्य
24 जो वन में घूमता हो वनचर
25 जो इस लोक से बाहर की बात हो अलौकिक
26 जो इस लोक की बात हो लौकिक
27 जिसके नीचे रेखा हो रेखांकित
28 जिसका संबंध पश्चिम से हो पाश्चात्य
29 जो स्थिर रहे स्थावर
30 दुखांत नाटक त्रासदी
31 जो क्षमा करने के योग्य हो क्षम्य
32 हिंसा करने वाला हिंसक
33 हित चाहने वाला हितैषी
34 हाथ से लिखा हुआ हस्तलिखित
35 सब कुछ जानने वाला सर्वज्ञ
36 जो स्वयं पैदा हुआ हो स्वयंभू
37 जो शरण में आया हो शरणागत
38 जिसका वर्णन न किया जा सके वर्णनातीत
39 फल-फूल खाने वाला शाकाहारी
40 जिसकी पत्नी मर गई हो विधुर
41 जिसका पति मर गया हो विधवा
42 सौतेली माँ विमाता
43 व्याकरण जाननेवाला वैयाकरण
44 रचना करने वाला रचयिता
45 खून से रँगा हुआ रक्तरंजित
46 अत्यंत सुन्दर स्त्री रूपसी
47 कीर्तिमान पुरुष यशस्वी
48 कम खर्च करने वाला मितव्ययी
49 मछली की तरह आँखों वाली मीनाक्षी
50 मयूर की तरह आँखों वाली मयूराक्षी
51 बच्चों के लिए काम की वस्तु बालोपयोगी
52 जिसकी बहुत अधिक चर्चा हो बहुचर्चित
53 जिस स्त्री के कभी संतान न हुई हो वंध्या (बाँझ)
54 फेन से भरा हुआ फेनिल
55 प्रिय बोलने वाली स्त्री प्रियंवदा
56 जिसकी उपमा न हो निरुपम
57 जो थोड़ी देर पहले पैदा हुआ हो नवजात
58 जिसका कोई आधार न हो निराधार
59 नगर में वास करने वाला नागरिक
60 रात में घूमने वाला निशाचर
61 ईश्वर पर विश्वास न रखने वाला नास्तिक
62 मांस न खाने वाला निरामिष
63 बिलकुल बरबाद हो गया हो ध्वस्त
64 जिसकी धर्म में निष्ठा हो धर्मनिष्ठ
65 देखने योग्य दर्शनीय
66 बहुत तेज चलने वाला द्रुतगामी
67 जो किसी पक्ष में न हो तटस्थ
68 तत्त्त्तव को जानने वाला तत्त्त्तवज्ञ
69 तप करने वाला तपस्वी
70 जो जन्म से अंधा हो जन्मांध
71 जिसने इंद्रियों को जीत लिया हो जितेंद्रिय
72 चिंता में डूबा हुआ चिंतित
73 जो बहुत समय कर ठहरे चिरस्थायी
74 जिसकी चार भुजाएँ हों चतुर्भुज
75 हाथ में चक्र धारण करनेवाला चक्रपाणि
76 जिससे घृणा की जाए घृणित
77 जिसे गुप्त रखा जाए गोपनीय
78 गणित का ज्ञाता गणितज्ञ
79 आकाश को चूमने वाला गगनचुंबी
80 जो टुकड़े-टुकड़े हो गया हो खंडित
818 आकाश में उड़ने वाला नभचर
82 तेज बुद्धिवाला कुशाग्रबुद्धि
83 कल्पना से परे हो कल्पनातीत
84 जो उपकार मानता है कृतज्ञ
85 किसी की हँसी उड़ाना उपहास
86 ऊपर कहा हुआ उपर्युक्त
87 ऊपर लिखा गया उपरिलिखित
88 जिस पर उपकार किया गया हो उपकृत
89 इतिहास का ज्ञाता अतिहासज्ञ
90 आलोचना करने वाला आलोचक
91 ईश्वर में आस्था रखने वाला आस्तिक
92 बिना वेतन का अवैतनिक
93 जो कहा न जा सके अकथनीय
94 जो गिना न जा सके अगणित
95 जिसका कोई शत्रु ही न जन्मा हो अजातशत्रु
96 जिसके समान कोई दूसरा न हो अद्वितीय
97 जो परिचित न हो अपरिचित
98 जिसकी कोई उपमा न हो अनुपम

3. विपरीतार्थक (विलोम शब्द)

शब्द विलोम शब्द विलोम शब्द विलोम
अथ इति आविर्भाव तिरोभाव आकर्षण विकर्षण
आमिष निरामिष अभिज्ञ अनभिज्ञ आजादी गुलामी
अनुकूल प्रतिकूल आर्द्र शुष्क अनुराग विराग
आहार निराहार अल्प अधिक अनिवार्य वैकल्पिक
अमृत विष अगम सुगम अभिमान नम्रता
आकाश पाताल आशा निराशा अर्थ अनर्थ
अल्पायु दीर्घायु अनुग्रह विग्रह अपमान सम्मान
आश्रित निराश्रित अंधकार प्रकाश अनुज अग्रज
अरुचि रुचि आदि अंत आदान प्रदान
आरंभ अंत आय व्यय अर्वाचीन प्राचीन
अवनति उन्नति कटु मधुर अवनी अंबर
क्रिया प्रतिक्रिया कृतज्ञ कृतघ्न आदर अनादर
कड़वा मीठा आलोक अंधकार क्रुद्ध शान्त
उदय अस्त क्रय विक्रय आयात निर्यात
कर्म निष्कर्म अनुपस्थित उपस्थित खिलना मुरझाना
आलस्य स्फूर्ति खुशी दुख, गम आर्य अनार्य
गहरा उथला अतिवृष्टि अनावृष्टि गुरु लघु
आदि अनादि जीवन मरण इच्छा अनिच्छा
गुण दोष इष्ट अनिष्ट गरीब अमीर
इच्छित अनिच्छित घर बाहर इहलोक परलोक
चर अचर उपकार अपकार छूत अछूत
उदार अनुदार जल थल उत्तीर्ण अनुत्तीर्ण
जड़ चेतन उधार नकद जीवन मरण
उत्थान पतन जंगम स्थावर उत्कर्ष अपकर्ष
उत्तर दक्षिण जटिल सरस गुप्त प्रकट
एक अनेक तुच्छ महान ऐसा वैसा
दिन रात देव दानव दुराचारी सदाचारी
मानवता दानवता धर्म अधर्म महात्मा दुरात्मा
धीर अधीर मान अपमान धूप छाँव
मित्र शत्रु नूतन पुरातन मधुर कटु
नकली असली मिथ्या सत्य निर्माण विनाश
मौखिक लिखित आस्तिक नास्तिक मोक्ष बंधन
निकट दूर रक्षक भक्षक निंदा स्तुति
पतिव्रता कुलटा राजा रंक पाप पुण्य
राग द्वेष प्रलय सृष्टि रात्रि दिवस
पवित्र अपवित्र लाभ हानि विधवा सधवा
प्रेम घृणा विजय पराजय प्रश्न उत्तर
पूर्ण अपूर्ण वसंत पतझर परतंत्र स्वतंत्र
विरोध समर्थन बाढ़ सूखा शूर कायर
बंधन मुक्ति शयन जागरण बुराई भलाई
शीत उष्ण भाव अभाव स्वर्ग नरक
मंगल अमंगल सौभाग्य दुर्भाग्य स्वीकृत अस्वीकृत
शुक्ल कृष्ण हित अहित साक्षर निरक्षर
स्वदेश विदेश हर्ष शोक हिंसा अहिंसा
स्वाधीन पराधीन क्षणिक शाश्वत साधु असाधु
ज्ञान अज्ञान सुजन दुर्जन शुभ अशुभ
सुपुत्र कुपुत्र सुमति कुमति सरस नीरस
सच झूठ साकार निराकार श्रम विश्राम
स्तुति निंदा विशुद्ध दूषित सजीव निर्जीव
विषम सम सुर असुर विद्वान मूर्ख

4. एकार्थक प्रतीत होने वाले शब्द

1. अस्त्र- जो हथियार हाथ से फेंककर चलाया जाए। जैसे-बाण।
शस्त्र- जो हथियार हाथ में पकड़े-पकड़े चलाया जाए। जैसे-कृपाण।
2. अलौकिक- जो इस जगत में कठिनाई से प्राप्त हो। लोकोत्तर।
अस्वाभाविक- जो मानव स्वभाव के विपरीत हो।
असाधारण- सांसारिक होकर भी अधिकता से न मिले। विशेष।
3. अमूल्य- जो चीज मूल्य देकर भी प्राप्त न हो सके।
बहुमूल्य- जिस चीज का बहुत मूल्य देना पड़ा।
4. आनंद- खुशी का स्थायी और गंभीर भाव।
आह्लाद- क्षणिक एवं तीव्र आनंद।
उल्लास- सुख-प्राप्ति की अल्पकालिक क्रिया, उमंग।
प्रसन्नता-साधारण आनंद का भाव।
5. ईर्ष्या- दूसरे की उन्नति को सहन न कर सकना।
डाह-ईर्ष्यायुक्त जलन।
द्वेष- शत्रुता का भाव।
स्पर्धा- दूसरों की उन्नति देखकर स्वयं उन्नति करने का प्रयास करना।
6. अपराध- सामाजिक एवं सरकारी कानून का उल्लंघन।
पाप- नैतिक एवं धार्मिक नियमों को तोड़ना।
7. अनुनय-किसी बात पर सहमत होने की प्रार्थना।
विनय- अनुशासन एवं शिष्टतापूर्ण निवेदन।
आवेदन-योग्यतानुसार किसी पद के लिए कथन द्वारा प्रस्तुत होना।
प्रार्थना- किसी कार्य-सिद्धि के लिए विनम्रतापूर्ण कथन।
8. आज्ञा-बड़ों का छोटों को कुछ करने के लिए आदेश।
अनुमति-प्रार्थना करने पर बड़ों द्वारा दी गई सहमति।
9. इच्छा- किसी वस्तु को चाहना।
उत्कंठा- प्रतीक्षायुक्त प्राप्ति की तीव्र इच्छा।
आशा-प्राप्ति की संभावना के साथ इच्छा का समन्वय।
स्पृहा-उत्कृष्ट इच्छा।
10. सुंदर- आकर्षक वस्तु।
चारु- पवित्र और सुंदर वस्तु।
रुचिर-सुरुचि जाग्रत करने वाली सुंदर वस्तु।
मनोहर- मन को लुभाने वाली वस्तु।
11. मित्र- समवयस्क, जो अपने प्रति प्यार रखता हो।
सखा-साथ रहने वाला समवयस्क।
सगा-आत्मीयता रखने वाला।
सुहृदय-सुंदर हृदय वाला, जिसका व्यवहार अच्छा हो।
12. अंतःकरण- मन, चित्त, बुद्धि, और अहंकार की समष्टि।
चित्त- स्मृति, विस्मृति, स्वप्न आदि गुणधारी चित्त।
मन- सुख-दुख की अनुभूति करने वाला।
13. महिला- कुलीन घराने की स्त्री।
पत्नी- अपनी विवाहित स्त्री।
स्त्री- नारी जाति की बोधक।
14. नमस्ते- समान अवस्था वालो को अभिवादन।
नमस्कार- समान अवस्था वालों को अभिवादन।
प्रणाम- अपने से बड़ों को अभिवादन।
अभिवादन- सम्माननीय व्यक्ति को हाथ जोड़ना।
15. अनुज- छोटा भाई।
अग्रज- बड़ा भाई।
भाई- छोटे-बड़े दोनों के लिए।
16. स्वागत- किसी के आगमन पर सम्मान।
अभिनंदन- अपने से बड़ों का विधिवत सम्मान।
17. अहंकार- अपने गुणों पर घमंड करना।
अभिमान- अपने को बड़ा और दूसरे को छोटा समझना।
दंभ- अयोग्य होते हुए भी अभिमान करना।
18. मंत्रणा- गोपनीय रूप से परामर्श करना।
परामर्श- पूर्णतया किसी विषय पर विचार-विमर्श कर मत प्रकट करना।

5.समोच्चरित शब्द

1. अनल=आग
अनिल=हवा, वायु
2. उपकार=भलाई, भला करना
अपकार=बुराई, बुरा करना
3. अन्न=अनाज
अन्य=दूसरा
4. अणु=कण
अनु=पश्चात
5. ओर=तरफ
और=तथा
6. असित=काला
अशित=खाया हुआ
7. अपेक्षा=तुलना में
उपेक्षा=निरादर, लापरवाही
8. कल=सुंदर, पुरजा
काल=समय
9. अंदर=भीतर
अंतर=भेद
10. अंक=गोद
अंग=देह का भाग
11. कुल=वंश
कूल=किनारा
12. अश्व=घोड़ा
अश्म=पत्थर
13. अलि=भ्रमर
आली=सखी
14. कृमि=कीट
कृषि=खेती
15. अपचार=अपराध उपचार=इलाज
16. अन्याय=गैर-इंसाफी
अन्यान्य=दूसरे-दूसरे
17. कृति=रचना
कृती=निपुण, परिश्रमी
18. आमरण=मृत्युपर्यंत
आभरण=गहना
19. अवसान=अंत
आसान=सरल
20. कलि=कलियुग, झगड़ा
कली=अधखिला फूल
21. इतर=दूसरा
इत्र=सुगंधित द्रव्य
22. क्रम=सिलसिला कर्म=काम
23. परुष=कठोर
पुरुष=आदमी
24. कुट=घर,किला
कूट=पर्वत
25. कुच=स्तन
कूच=प्रस्थान
26. प्रसाद=कृपा
प्रासादा=महल
27. कुजन=दुर्जन
कूजन=पक्षियों का कलरव
28. गत=बीता हुआ गति=चाल
29. पानी=जल
पाणि=हाथ
30. गुर=उपाय
गुरु=शिक्षक, भारी
31. ग्रह=सूर्य,चंद्र
गृह=घर
32. प्रकार=तरह
प्राकार=किला, घेरा
33. चरण=पैर
चारण=भाट
34. चिर=पुराना
चीर=वस्त्र
35. फन=साँप का फन
फ़न=कला
36. छत्र=छाया
क्षत्र=क्षत्रिय,शक्ति
37. ढीठ=दुष्ट,जिद्दी
डीठ=दृष्टि
38. बदन=देह
वदन=मुख
39. तरणि=सूर्य
तरणी=नौका
40. तरंग=लहर
तुरंग=घोड़ा
41. भवन=घर
भुवन=संसार
42. तप्त=गरम
तृप्त=संतुष्ट
43. दिन=दिवस
दीन=दरिद्र
44. भीति=भय
भित्ति=दीवार
45. दशा=हालत
दिशा=तरफ़
46. द्रव=तरल पदार
अथ द्रव्य=धन
47. भाषण=व्याख्यान
भीषण=भयंकर
48. धरा=पृथ्वी
धारा=प्रवाह
49. नय=नीति
नव=नया
50. निर्वाण=मोक्ष
निर्माण=बनाना
51. निर्जर=देवता निर्झर=झरना
52. मत=राय
मति=बुद्धि
53. नेक=अच्छा
नेकु=तनिक
54. पथ=राह
पथ्य=रोगी का आहार
55. मद=मस्ती
मद्य=मदिरा
56. परिणाम=फल
परिमाण=वजन
57. मणि=रत्न
फणी=सर्प
58. मलिन=मैला
म्लान=मुरझाया हुआ
59. मातृ=माता
मात्र=केवल
60. रीति=तरीका
रीता=खाली
61. राज=शासन
राज=रहस्य
62. ललित=सुंदर
ललिता=गोपी
63. लक्ष्य=उद्देश्य
लक्ष=लाख
64. वक्ष=छाती
वृक्ष=पेड़
65. वसन=वस्त्र
व्यसन=नशा, आदत
66. वासना=कुत्सित
विचार बास=गंध
67. वस्तु=चीज
वास्तु=मकान
68. विजन=सुनसान
व्यजन=पंखा
69. शंकर=शिव
संकर=मिश्रित
70. हिय=हृदय
हय=घोड़ा
71. शर=बाण
सर=तालाब
72. शम=संयम
सम=बराबर
73. चक्रवाक=चकवा
चक्रवात=बवंडर
74. शूर=वीर
सूर=अंधा
75. सुधि=स्मरण
सुधी=बुद्धिमान
76. अभेद=अंतर नहीं
अभेद्य=न टूटने योग्य
77. संघ=समुदाय
संग=साथ
78. सर्ग=अध्याय
स्वर्ग=एक लोक
79. प्रणय=प्रेम
परिणय=विवाह
80. समर्थ=सक्षम
सामर्थ्य=शक्ति
81. कटिबंध=कमरबंध
कटिबद्ध=तैयार
82. क्रांति=विद्रोह
क्लांति=थकावट
83. इंदिरा=लक्ष्मी
इंद्रा=इंद्राणी

6. अनेकार्थक शब्द

1. अक्षर= नष्ट न होने वाला, वर्ण, ईश्वर, शिव।
2. अर्थ= धन, ऐश्वर्य, प्रयोजन, हेतु।
3. आराम= बाग, विश्राम, रोग का दूर होना।
4. कर= हाथ, किरण, टैक्स, हाथी की सूँड़।
5. काल= समय, मृत्यु, यमराज।
6. काम= कार्य, पेशा, धंधा, वासना, कामदेव।
7. गुण= कौशल, शील, रस्सी, स्वभाव, धनुष की डोरी।
8. घन= बादल, भारी, हथौड़ा, घना।
9. जलज= कमल, मोती, मछली, चंद्रमा, शंख।
10. तात= पिता, भाई, बड़ा, पूज्य, प्यारा, मित्र।
11. दल= समूह, सेना, पत्ता, हिस्सा, पक्ष, भाग, चिड़ी।
12. नग= पर्वत, वृक्ष, नगीना।
13. पयोधर= बादल, स्तन, पर्वत, गन्ना।
14. फल= लाभ, मेवा, नतीजा, भाले की नोक।
15. बाल= बालक, केश, बाला, दानेयुक्त डंठल।
16. मधु= शहद, मदिरा, चैत मास, एक दैत्य, वसंत।
17. राग= प्रेम, लाल रंग, संगीत की ध्वनि।
18. राशि= समूह, मेष, कर्क, वृश्चिक आदि राशियाँ।
19. लक्ष्य= निशान, उद्देश्य।
20. वर्ण= अक्षर, रंग, ब्राह्मण आदि जातियाँ।
21. सारंग= मोर, सर्प, मेघ, हिरन, पपीहा, राजहंस, हाथी, कोयल, कामदेव, सिंह, धनुष भौंरा, मधुमक्खी, कमल।
22. सर= अमृत, दूध, पानी, गंगा, मधु, पृथ्वी, तालाब।
23. क्षेत्र= देह, खेत, तीर्थ, सदाव्रत बाँटने का स्थान।
24. शिव= भाग्यशाली, महादेव, श्रृगाल, देव, मंगल।
25. हरि= हाथी, विष्णु, इंद्र, पहाड़, सिंह, घोड़ा, सर्प, वानर, मेढक, यमराज, ब्रह्मा, शिव, कोयल, किरण, हंस।

7. पशु-पक्षियों की बोलियाँ

पशु बोली पशु बोली पशु बोली
ऊँट बलबलाना कोयल कूकना गाय रँभाना
चिड़िया चहचहाना भैंस डकराना (रँभाना) बकरी मिमियाना
मोर कुहकना घोड़ा हिनहिनाना तोता टैं-टैं करना
हाथी चिघाड़ना कौआ काँव-काँव करना साँप फुफकारना
शेर दहाड़ना सारस क्रें-क्रें करना

टिटहरी टीं-टीं करना कुत्ता भौंकना मक्खी भिनभिनाना


8. कुछ जड़ पदार्थों की विशेष ध्वनियाँ या क्रियाएँ

जिह्वा लपलपाना दाँत किटकिटाना
हृदय धड़कना पैर पटकना
अश्रु छलछलाना घड़ी टिक-टिक करना
पंख फड़फड़ाना तारे जगमगाना
नौका डगमगाना मेघ गरजना

9. कुछ सामान्य अशुद्धियाँ

अशुद्ध शुद्ध अशुद्ध शुद्ध अशुद्ध शुद्ध अशुद्ध शुद्ध
अगामी आगामी लिखायी लिखाई सप्ताहिक साप्ताहिक अलोकिक अलौकिक
संसारिक सांसारिक क्यूँ क्यों आधीन अधीन हस्ताक्षेप हस्तक्षेप
व्योहार व्यवहार बरात बारात उपन्यासिक औपन्यासिक क्षत्रीय क्षत्रिय
दुनियां दुनिया तिथी तिथि कालीदास कालिदास पूरती पूर्ति
अतिथी अतिथि नीती नीति गृहणी गृहिणी परिस्थित परिस्थिति
आर्शिवाद आशीर्वाद निरिक्षण निरीक्षण बिमारी बीमारी पत्नि पत्नी
शताब्दि शताब्दी लड़ायी लड़ाई स्थाई स्थायी श्रीमति श्रीमती
सामिग्री सामग्री वापिस वापस प्रदर्शिनी प्रदर्शनी ऊत्थान उत्थान
दुसरा दूसरा साधू साधु रेणू रेणु नुपुर नूपुर
अनुदित अनूदित जादु जादू बृज ब्रज प्रथक पृथक
इतिहासिक ऐतिहासिक दाइत्व दायित्व सेनिक सैनिक सैना सेना
घबड़ाना घबराना श्राप शाप बनस्पति वनस्पति बन वन
विना बिना बसंत वसंत अमावश्या अमावस्या प्रशाद प्रसाद
हंसिया हँसिया गंवार गँवार असोक अशोक निस्वार्थ निःस्वार्थ
दुस्कर दुष्कर मुल्यवान मूल्यवान सिरीमान श्रीमान महाअन महान
नवम् नवम क्षात्र छात्र छमा क्षमा आर्दश आदर्श
षष्टम् षष्ठ प्रंतु परंतु प्रीक्षा परीक्षा मरयादा मर्यादा
दुदर्शा दुर्दशा कवित्री कवयित्री प्रमात्मा परमात्मा घनिष्ट घनिष्ठ
राजभिषेक राज्याभिषेक पियास प्यास वितीत व्यतीत कृप्या कृपा
व्यक्तिक वैयक्तिक मांसिक मानसिक समवाद संवाद संपति संपत्ति
विषेश विशेष शाशन शासन दुःख दुख मूलतयः मूलतः
पिओ पियो हुये हुए लीये लिए सहास साहस
रामायन रामायण चरन चरण रनभूमि रणभूमि रसायण रसायन
प्रान प्राण मरन मरण कल्यान कल्याण पडता पड़ता
ढ़ेर ढेर झाडू झाड़ू मेंढ़क मेढक श्रेष्ट श्रेष्ठ
षष्टी षष्ठी निष्टा निष्ठा सृष्ठि सृष्टि इष्ठ इष्ट
स्वास्थ स्वास्थ्य पांडे पांडेय स्वतंत्रा स्वतंत्रता उपलक्ष उपलक्ष्य
महत्व महत्त्त्व आल्हाद आह्लाद उज्वल उज्जवल व्यस्क वयस्क